संपूर्ण महाराष्ट्रात झालेले जिल्हास्तरीय मराठा क्रांती मोर्चे….

संपूर्ण महाराष्ट्रात झालेले जिल्हास्तरीय मराठा क्रांती मोर्चे

मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद..९ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद ९ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद
९ ऑगस्ट

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मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद..२६ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, उस्मनाबाद

मराठा क्रांती मोर्चा, उस्मनाबाद

मराठा क्रांती मोर्चा, जळगाव २९ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, जळगाव

मराठा क्रांती मोर्चा, जळगाव

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड ३० ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी ३ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली १७ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड १८ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना १९ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा अकोला १९ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा अकोला

मराठा क्रांती मूक मोर्चा अकोला

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर २१ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा नवी मुंबई २१ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा नवी मुंबई

मराठा क्रांती मूक मोर्चा नवी मुंबई

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती २२ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर २३ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक २४ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे २५ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम २५ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ २५ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा २६ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सांगली २७ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सांगली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सांगली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे २८ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा ३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर १५ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे १६ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर १९ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वर्धा २३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वर्धा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वर्धा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग २३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड) २३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

PHOTO COURTESY:-
मराठा क्रांती महाराष्ट्र

संपूर्ण महाराष्ट्रात झालेले जिल्हास्तरीय मराठा क्रांती मोर्चे….

संपूर्ण महाराष्ट्रात झालेले जिल्हास्तरीय मराठा क्रांती मोर्चे

मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद..९ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद ९ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद
९ ऑगस्ट

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मराठा क्रांती मोर्चा, औरंगाबाद..२६ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, उस्मनाबाद

मराठा क्रांती मोर्चा, उस्मनाबाद

मराठा क्रांती मोर्चा, जळगाव २९ ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, जळगाव

मराठा क्रांती मोर्चा, जळगाव

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड ३० ऑगस्ट

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मोर्चा, बीड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी ३ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, परभणी

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली १७ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा, हिंगोली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड १८ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – नांदेड

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना १९ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – जालना

मराठा क्रांती मूक मोर्चा अकोला १९ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा अकोला

मराठा क्रांती मूक मोर्चा अकोला

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर २१ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मोर्चा – सोलापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा नवी मुंबई २१ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा नवी मुंबई

मराठा क्रांती मूक मोर्चा नवी मुंबई

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती २२ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अमरावती

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर २३ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – अहमदनगर

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक २४ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मोर्चा – नाशिक

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे २५ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पुणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम २५ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वाशीम

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ २५ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मोर्चा – यवतमाळ

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा २६ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – बुलढाणा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सांगली २७ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सांगली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सांगली

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे २८ सप्टेंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – धुळे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा ३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सातारा

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर १५ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – कोल्हापूर

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मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे १६ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – ठाणे

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मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर १९ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – चंद्रपूर

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मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वर्धा २३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – वर्धा

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मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग २३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग

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मराठा क्रांती मूक मोर्चा – सिंधुदुर्ग

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मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड) २३ ऑक्टोंबर

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

मराठा क्रांती मूक मोर्चा – पालघर(रायगड)

PHOTO COURTESY:-
मराठा क्रांती महाराष्ट्र

जाणून घ्या उदयन राजे बद्दल…

Birthday / Childhood and Education जन्म आणि शिक्षण

Udayan Raje Childhood Photo

Udayan Raje Childhood Photo

इंग्रजांनी भारताततल्या राजांना आपलं मांडलीक बनवलं. आणि देशावर सत्ता सुरू केली. राजांनी बंड करू नये म्हणून त्यांनी राजांचे अधिकार कायम ठेवले.त्यांच्या राजेपणाला धक्का लागू दिला नाही. पुढे वल्लभाई पटेल यांनी राजेशाही खालसा केली. पण त्यांना पगार सुरू केला. तर इंदिरा गांधींनी त्यांचे पगारही थांबवले. राजेशाही संपुष्टात आली. पण लोकांच्या मनातलं राजघराण्यांबाबतचा आदर आणि आकर्षण काही संपलं नाही. महाराष्ट्राचं आराध्य दैवत म्हणजे छत्रपती शिवाजी महाराज आणि शिवाजी महाराजांचे तेरावे वंशज आहेत उदयनराजे भोसले. छत्रपतींच्या साताऱ्याच्या गादीचे वंशज आहेत उदयनराजे भोसले. २४ फेब्रुवारी १९६६ ला उदयनराजे भोसले यांचा

जन्म झाला. त्यांचं प्रार्थमिक शिक्षण देहरादूनला झालं. त्यांचं शिक्षण सुरु असतांनाच वडील प्रतापसिंह भोसले यांचं निधन झालं आणि उदयनराजे यांनी पुढचं शिक्षण पाचगणिला पूर्ण केलं. उदयनराजे यांनी

पुण्यातून इंजिनिअरिंगची पदवी घेतली.तर इंग्लंडमधन एमबीए केलं. आणि १९९० मध्ये उदयनराजे साताऱ्याला परतले.

old Family Photos Of UdayanRaje

old Family Photos Of UdayanRaje

Political Journey सुरवात राजकीय प्रवासाची

राजघराण्यात जन्माला आल्यावर त्या व्यक्तीनं राजकारणाचा रस्ता धरावा ही जणू रितचं झाली होती. राजघराण्यांचं ‘राजे’पण गेलं होतं. त्यामुळे पुन्हा राजकीय वर्चस्वासाठी लोकशाहीचा म्हणजेच निवडणुकीच्या राजकारणाचा रस्ता, राजघराण्यांनी स्वीकारला. १९९०मध्ये उच्चाशिक्षण घेऊन परतल्यानंतर, उदयनराजे भोसलेंनीही तोच मार्ग स्वीकारला. आणि निवडणुकीच्या राजकारणात उडी घेतली. १९९१मध्ये ते नगरसेवक म्हणून निवडूण आले. उदयनराजे भोसलेंनी भाजपचा रस्ता धरला आणि भाजपच्या तिकीटावर ते निवडूण आले. एवढेच नव्हे तर त्यांना राज्यमंत्रीपदही मिळालं. 1998-99मध्ये उदयनराजे भोसले राज्याचे महसूल राज्यमंत्री होते. भाजपमध्ये गोपीनाथ मुंडेंशी उदयनराजेंची खास जवळीक होती. पण जेम्स लेन प्रकरणी भाजपनं योग्य भूमिका घेतली नाही. असा आरोप करत

UdayanRaje with Vilasrao Deshmukh

UdayanRaje with Vilasrao Deshmukh

उदयनरजे भाजपमधून बाहेर पडले. आणि त्यानंतर त्यांनी राष्ट्रवादी काँग्रेसची वाट धरली.

राष्ट्रवादीच्या तिकीटावर ते दोन वेळा लोकसभेवर निवडूण गेलेत.

थोडक्यात राजकीय प्रवास

1998-99 – विधानसभेवर निवड, राज्याचे महसूल राज्यमंत्री

2009 – लोकसभेवर निवड

2009 – विज्ञान आणि तंत्रज्ञान समितीचे सदस्य ; पर्यावरण समितीचे सदस्य

2010 – रसायण आणि खते समितीचे सदस्य

2014 – पुन्हा लोकसभेवर निवड

Family / कुटुंब

दमयंतीराजे भोसले या उदयनराजे भोसले यांच्या पत्नी आहेत. उदयनराजे यांच्या प्रचारात त्या कायम आघाडीवर असतात. उदयनराजे यांना एक मुलगा आणि मुलगी आहे.

Hobbies / छंद

उदयनराजे भोसले यांचे छंदही राजासारखेच आहेत. त्यांना फॉर्म्युला वनची आवड आहे. वेगाने गाडी चालवणे त्यांना आवडत. आणि सातारा ते पुणे अंतर पस्तीत मिनीटांत पार करू शकतो असा त्यांचा दावाही आहे. शिवाय त्यांना बॉक्सींगचीही आवड आहे.

महाराजांच्या ताफ्यात नेहमी 10 ते 12 आलिशान गाड्या असतात.
महाराज मोटारसायकल, ट्रॅक्टर रिक्षा सर्व वाहने चालवणे पसंत करतात.

छत्रपतींची सातारा व करवीर गादी : इतिहास व परस्पर संबंध…

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छत्रपती शिवरायांनी माँसाहेब जिजाऊ व शहाजीराजेंच्या प्रेरणेने स्वराज्य निर्माण केले व या स्वराज्यास सार्वभौमत्व मिळवून देण्यासाठी सन १६७४ साली रयतेसाठी स्वतंत्र व सार्वभौम “छत्रपति” गादी स्थापन केली. या गादीचे प्रथम छत्रपति, स्वराज्य निर्माते शिवछत्रपति महाराजांच्या निर्वाणानंतर युवराज संभाजीराजे ‘छत्रपति’ झाले. संभाजी महाराजांनी आपल्या नऊ वर्षांच्या कार्यकालात किती संकटांना तोंड देत रयतेचे स्वातंत्र्य अबाधित ठेवले इथपर्यंतचा इतिहास आपल्याला ज्ञात आहेच मात्र संभाजी महाराजांच्या बलिदानानंतर खऱ्या अर्थाने स्वराज्याचे रक्षण केले ते शिवरायांचे सुपुत्र, स्वराज्याचे तिसरे छत्रपति राजाराम महाराज व शिवस्नुषा महाराणी ताराबाई यांनी.

१६८९ साली शंभूराजेंच्या बलिदानानंतर महाराणी येसूबाईंनी आपले धाकटे दीर युवराज राजाराम महाराजांना गादीवर बसविण्याचा निर्णय घेतला. महाराणी येसूबाई व युवराज राजाराम महाराज रायगडावर होते व रायगडास मुघल फौजेने वेढा घातला होता. राजाराम महाराजांना गादीवर आणण्यासाठी प्रथम महाराजांना सुरक्षित ठिकाणी पाठविणे गरजेचे होते. त्यामुळे येसूबाई राणीसरकारांच्या आदेशाने काही मोजक्या मावळ्यांसह राजाराम महाराज रायगडचा वेढा भेदून प्रथम प्रतापगड- पन्हाळा व तेथून दक्षिणेस जिंजी किल्यावर आले.

महाराज रायगडाहून बाहेर पडल्यानंतर लवकरच मुघलांनी रायगड ताब्यात घेऊन महाराणी येसूबाई व शंभूपुत्र युवराज शाहूंना कैद केले. छत्रपति राजाराम महाराजांनी महाराष्ट्रापासून हजारो कोस दूर असणाऱ्या जिंजीमधून युद्धाची सूत्रे हलविण्यास सुरुवात केली. महाराजांनी अत्यंत पराकाष्ठेने औरंगजेबाच्या सेनासागराशी लढत देत स्वराज्याचे अस्तित्व टिकवून ठेवले मात्र दुष्ट काळाने महाराजांवर घाला घातला. छत्रपति राजाराम महाराजांचे अगदी तरुण वयात आकस्मिक निधन झाले. स्वराज्याचे युवराज शंभूपुत्र शाहू मुघलांच्या कैदेत होते. राजाराम महाराजांचे पुत्र शिवाजीराजे व संभाजीराजे अगदी लहान होते. स्वराज्याला छत्रपति अथवा प्रबळ नेतृत्व उरले नव्हते. औरंगजेब हर्षाने उन्मत्त झाला. मराठ्यांचे राज्य आता आपल्या ताब्यात येणार याचा त्याला आत्मविश्वास वाटू लागला. मात्र राजाराम महाराजांच्या पत्नी शिवस्नुषा महाराणी ताराबाई यांनी राज्यकारभाराची सूत्रे हाती घेत औरंगजेबाच्या सेनासागरावर त्वेषाने हल्ले चढवले. स्वतः युद्धांचे नेतृत्व करीत मुघल फौजेस पळून जाण्यासही जागा सोडली नाही. महाराष्ट्र गिळायल्या आलेल्या औरंगजेबाचे थडगे महाराष्ट्राच्या महाराणीने याच महाराष्ट्रात बांधले ! मराठ्यांचे स्वातंत्र्ययुद्ध महाराणी ताराबाईंच्या नेतृत्वाखाली मराठ्यांनी जिंकले.

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औरंगजेबाच्या मृत्यूनंतर त्याचा मुलगा आझमशाह याने मराठ्यांमध्ये छत्रपतींच्या गादीसाठी दुफळी माजावी या दुष्ट हेतूने शंभूपुत्र शाहू महाराजांना कैदेतून मुक्त केले. शाहू महाराजांनी छत्रपतींच्या गादीवर आपला हक्क सांगितला मात्र त्यांनी मुघलांच्या सनदा आणल्याचे सांगत ताराराणींनी तो अमान्य केला. शाहू संभाजीराजेंचे पुत्र ; त्यामुळे गादीवर प्रथम अधिकार त्यांचा ! या भावनेने कित्येक बडे सरदार शाहूंना सामील झाले मात्र एक स्त्री असूनही रणांगणावर उतरुन स्वराज्याचे रक्षण करणाऱ्या महाराणी ताराबाईंचा शब्द प्रमाण मानून काही सरदार ताराराणींच्या बाजूने उभे राहिले. यामुळे मराठ्यांमध्ये दुफळी निर्माण झाली व शाहू महाराज व ताराराणींमध्ये गादीसाठी युद्ध झाले. त्यावेळी मराठा साम्राज्याची राजधानी साताऱ्यास होती मात्र युद्धामध्ये पराजित झाल्यामुळे ताराराणींनी पन्हाळगडावर आश्रय घेतला. नियतीचे खेळ पहा, ज्या ताराराणींनी अर्ध्या जगावर राज्य करणाऱ्या औरंगजेबाच्या पाच लाख सेनेशी मूठभर सैन्यानीशी सात वर्षे यशस्वी झुंज दिली त्याच ताराराणींना मुलाप्रमाणे असणाऱ्या आपल्या पुतण्याकडून हार पत्करावी लागली.

photos of chatrapati

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युद्धात विजयी झाल्यानंतर शाहू महाराजांनी साताऱ्यास स्वतःस राज्याभिषेक करवून घेतला व १७०७ साली ताराराणींनी पन्हाळगडावर करवीर गादीची स्वतंत्र स्थापना केली. रयतेच्या स्वराज्याची दोन शकले झाली व सातारा व करवीर अशा छत्रपतींच्या दोन गाद्या अस्तित्वात आल्या. सुरुवातीस ताराराणी व शाहू महाराजांमध्ये गादीसाठी युद्ध झाले मात्र करवीर गादीच्या स्वतंत्र स्थापनेनंतरही महाराणी ताराराणी छत्रपती शाहू महाराजांकडे साताऱ्यासच असायच्या. शाहू महाराजांच्या मनात ताराराणींबद्दल प्रचंड आदर होता. आपल्या पत्रांत महाराज ताराराणींचा उल्लेख “मातोश्री” असा करायचे. पुढे शाहू महाराजांस पुत्र नसल्याने त्यांनी करवीर गादीहून ताराराणींचे नातू व आपले पुतणे युवराज रामराजे यांना दत्तक घेतले. शाहू महाराजांनंतर युवराज रामराजे सातारच्या गादीवर छत्रपति झाले. ज्या शाहू महाराजांनी शिवाजीराजांस छत्रपति होण्यास विरोध केला त्याच शाहूंना शिवाजीराजांच्याच मुलाला दत्तक घेऊन छत्रपति करावे लागले. दरम्यान, सातारा व करवीर छत्रपति महाराजांमध्ये सन १७३१ साली ‘वारणेचा तह’ होऊन दोन्ही राज्ये स्थिरस्थावर झाली होती व परस्परांच्या गाद्यांस दोन्ही छत्रपतिंनी मान्यता दिली होती.

करवीर छत्रपति व सातारकर छत्रपति यांच्यातील वाद हा वारणेचा तह म्हणजेच सन १७३१ पर्यंतच मर्यादित राहिला. वारणेच्या तहानंतर दोन्ही छत्रपतींमध्ये अत्यंत सलोख्याचे संबंध होते. कोल्हापूरचे संभाजीराजे अनेकदा सातारला येऊन शाहू महाराजांकडे राहत असत. वारणेच्या तहानंतर पुन्हा कधीही सातारा व करवीर छत्रपतींमध्ये वितुष्ट आले नाही, उलट वेगवेगळ्या प्रसंगी सातारचे छत्रपतिही कोल्हापूरास छत्रपतिंकडे राहण्यास येत असत. छत्रपति प्रतापसिंह महाराज कोल्हापूरास आले असताना कोल्हापूरास छत्रपति महाराजांनी त्यांचे केलेले भव्य स्वागत व त्यांचा पाहुणचार यावर अत्यंत वाचनीय असा समकालीन लेख उपलब्ध आहे. ( याच प्रतापसिंह महाराजांचे चरित्र लिहावे, हि कोल्हापूरचे छत्रपति शाहू महाराजांनी मृत्यूशय्येवर असताना व्यक्त केलेली महाराजांची शेवटची इच्छा होती. )

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जेव्हा सातारच्या पेशव्यांनी व त्यांच्या सरदारांनी सातारकर छत्रपतींना कैद करुन राज्यकारभार स्वतःच्या हाती घेतला, तेव्हा करवीरचे छत्रपति फौजफाटा घेऊन सातारकर छत्रपतींच्या मदतीस धावले होते, मात्र दुर्दैवाने छत्रपतींना त्यामध्ये यश आले नाही. याच कारणांनी करवीर छत्रपतींचा पेशव्यांशी वारंवार संघर्ष होत राहिला. वारणेच्या तहानंतर पेशव्यांनी अथवा पेशव्यांच्या आदेशाने ज्या सरदारांनी करवीर राज्यावर हल्ले केले होते, त्यातील एकासही सातारकर छत्रपति महाराजांची परवानगी अथवा पाठिंबा नव्हता. पेशव्यांच्या राज्यलोभामुळेच पेशवे कोल्हापूर राज्यावर हल्ले करायचे. मात्र यामुळे दोन्ही छत्रपतींचे परस्परांशी असलेल्या अत्यंत प्रेमाच्या व सलोख्याच्या संबंधांस गालबोट लागले नाही.

करवीर व सातारा गादीच्या छत्रपतींचे सलोख्याचे संबंध आजपर्यंत टिकून आहेत. आई भवानीच्या कृपेने व माँसाहेब जिजाऊंच्या शिकवणीने हे संबंध असेच दृढ राहतील….

#करवीर_राज्य #सातारा_राज्य #KarvirRiyasatFB

छायाचित्रे –
• अंबारीमध्ये विराजमान छत्रपति शाहू महाराज व छत्रपति संभाजीराजे ( ऐतिहासिक पेंटींग ),
• कोल्हापूरचे महाराजकुमार मालोजीराजे व सातारचे छत्रपति उदयनराजे,
• नवीन राजवाडा कोल्हापूर येथे महाराजकुमार मालोजीराजे, छत्रपति शाहू महाराज व छत्रपति उदयनराजे,
• युवराज संभाजीराजे व छत्रपति उदयनराजे,
• छत्रपति उदयनराजे व छत्रपति शाहू महाराज.

करवीर रियासत

छत्रपती उदयनराजे भोंसले यांच्या बद्दल ह्या गोष्टी आपणास माहिती आहे का ?

‘मला हवं तसंच मी राहणार. राजघराण्यात जन्माला आलो असलो तरी मी स्वतःला हवं तसंच राहतो. दुसरे लोक काय बोलतात याची मला पर्वा नाही.’ श्रीमंत छत्रपती उदयनराजे प्रतापसिंह महाराज भोसले अत्यंत ठामपणे पण खूपच हळू आवाजात बोलत होते. ते बोलतात तेव्हा त्यांना प्रतिप्रश्न विचारायची कुणाची हिंमत होत नाही.’

अगदी सगळ्या राजकीय नेत्यांना भंडावून सोडणार्‍या सातार्‍यातल्या पत्रकारांचीही नाही!

सहा फूट उंच आणि भारदस्त शरीरयष्टीच्या उदयनराजेंचं व्यक्तिमत्त्व खरोखरच राजेशाही आहे. एकदम ‘ब्ल्यू ब्लडेड प्रिन्स’! त्यांच्या चालण्या-बोलण्यात राजाची बेफिकिरी क्षणाक्षणाला जाणवते. धारदार नाक आणि रोखून बघणारे त्यांचे डोळे अनेकदा समोरच्याला घाम फोडतात. लोक त्यांना थोडे घाबरूनच असतात. थोडं अंतरही ठेवतात. पण मध्येच अचानक उदयनराजेंचा मूड बदलतो आणि सगळीकडे हास्याची कारंजी उडतात. लोकांना धक्का द्यायला उदयनराजेंना खूप आवडतं.

उदयनराजेंबद्दल सातार्‍यातच नव्हे तर राज्यभर अनेक आख्यायिका प्रसिद्ध आहेत. सातार्‍यातील पत्रकारांमध्ये तर या आख्यायिका मोठया चवीने चघळल्या जातात. पत्रकार परिषद असो वा राजकीय मेळावा; उदयनराजे नेहमीच मद्यधुंद अवस्थेत असतात, किंवा त्यांच्या जलमंदिर वाडय़ावर त्यांना आड जाणार्‍यांना ते चाबकाने फोडून काढतात, या अशाच काही आख्यायिका. त्या खोटया असतील, कदाचित खर्‍याही असतील. पण त्यामुळे उदयनराजेंच्या इतर चांगल्या-वाईट गुणांकडे दुर्लक्ष करायचं काही कारण नाही.

लोकसभा निवडणुकीत विजयी झाल्यानंतर खासदार बनलेल्या उदयनराजे भोसले यांचा सातार्‍यातला दबदबा वाढला आहे. याचा अर्थ त्यापूर्वी त्यांचा दबदबा नव्हता असा नाही. अवघ्या महाराष्ट्राचे आराध्यदैवत असलेल्या छत्रपती शिवाजी महाराजांचे ‘थेट’ तेरावे वंशज असलेल्या उदयनराजेंविषयी सातारकरांच्या हृदयात एक वेगळीच आदराची जागा आहे. लोक त्यांना प्रेमाने ‘महाराज साहेब’ म्हणतात. आजही बरेचसे लोक त्यांना (अर्धवट) मुजरा करतात. भले मग उदयनराजेंचं त्यांच्याकडे लक्ष असो वा नसो.

सातारा शहराच्या मधोमध वसलेल्या जलमंदिर या भोसले घराण्याच्या परंपरागत वाडय़ापासून हाकेच्या अंतरावर असलेल्या ‘हॉटेल राजकुमार रिजन्सी’मध्ये उदयनराजे भेटले तेव्हा असे अनेक अनुभव आले. ‘महाराज साहेबां’मधल्या सामान्य माणसाला जाणून घेता आलं. उदयनराजे म्हणजे एकदम रांगडा गडी! फर्स्ट इम्प्रेशनच झक्कास. त्यात तुमच्या नशिबाने महाराज साहेबांचा मूड असेल तर बातही क्या!

‘माझ्या आईवडिलांचे माझ्यावर अनंत उपकार आहेत. त्यांनी मला अगदी पहिलीपासूनच शिक्षणासाठी हॉस्टेलवर ठेवलं. त्यामुळे राजघराण्याच्या वारशाचं ओझं मला लहानपणी कधी जाणवलंच नाही. मी इतरांपेक्षा वेगळा आहे असंही कधी वाटलं नाही. शाळेत जो मला चॉकलेट द्यायचा तो माझा मित्र! राजेशाहीपासून मी खूपच लांब होतो,’ उदयनराजे सांगत होते.

शालेय शिक्षण डून स्कूलमधून पूर्ण केल्यानंतर उदयनराजेंनी पुण्यात इंजिनीअरिंग केलं. तिथेही भरपूर दंगा-मस्ती केली. त्यावेळी आपण कधीतरी राजकारणात पडू असं त्यांना स्वप्नातही वाटलं नव्हतं. त्यांचं स्वप्न होतं ‘फॉर्मुला वन रेस’मध्ये भाग घ्यायचं. खरं तर त्यात त्यांना करीअरच करायचं होतं. आपल्या या स्वप्नाविषयी बोलताना ते हरखून गेल्यासारखे वाटले. ते म्हणाले, ‘मला वेगाचं प्रचंड वेड आहे. त्यामुळेच असेल कदाचित, राजकारणात पडण्यापूर्वी मी रेसिंगमध्येच करीअर करायचा विचार खूप गंभीरपणे केला होता. पण ते काही जमून आलं नाही.’

Entarance Jalmandir Palace

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‘फॉर्मुला वन’मध्ये सहभागी होता आलं नाही म्हणून वेगवान ड्रायव्हिंगची आवड कमी झाली नाही. पुणे-सातारा मेगाहायवेच्या रूपाने त्यांना नवा ट्रॅक सापडला. सातारा-पुणे हे ११० किमीचं अंतर उदयनराजेंनी फक्त ३५ मिनिटांत पार केल्याची आख्यायिका सातार्‍यात ऐकायला मिळते. उदयनराजेंनीही हे खरं असल्याचं सांगितलं. (वर, खोटं वाटत असेल तर पुण्यात सोडू का; म्हणूनही विचारलं. आता बोला!) फेरारी किंवा बुगाटीसारखी एखादी चांगली रेसिंग कार घेण्याची बर्‍याच दिवसांपासून इच्छा आहे, असं मनमोकळेपणाने सांगत ‘हॉर्स रायडिंगही मी चांगलं करतो, पण आता पूर्वीसारखा वेळ मिळत नाही,’ अशी खंत ते व्यक्त करतात.

हॉर्स रायडिंग, कार ड्रायव्हिंग अशा आवडी असलेले उदयनराजे म्हणजे एकदम हाय-फाय माणूस, असं एखाद्याला वाटेल, पण वस्तुस्थिती तशी अजिबात नाही. फॉर्मल क्लोथचा त्यांना तिटकारा. मग राजेशाही वेशभूषेची बातच सोडा. राजकीय सभांच्या वेळी अगदी नाइलाज म्हणून ते सदरा लेंगा घालतात. त्याला ते ‘पांढरी गोणी’ म्हणतात. ‘जीन, त्यावर एखादा कॅज्युअल शर्ट आणि पायात कोल्हापुरी चप्पल’ हा महाराज साहेबांचा फेवरेट ड्रेसकोड!

UdayanRaje Bike

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दिनचर्येचा विषय निघाला तेव्हा ‘राजकारण करायचं असेल तर सकाळी लवकर उठावं लागतं, हा पवार्रफुल अलार्म आठवला. रात्री झोपायला कितीही उशीर झाला (उशीर होण्यासाठी अनेक कारणं आहेत) तरी महाराज साहेब सकाळी साडेसहा वाजताच उठतात! (असं त्यांनी सांगितलं.) त्यानंतर व्यायाम असतोच. त्यांच्या शब्दात भरपूर व्यायाम. जॉगिंग दररोजचं.

UdayanRaje With Car

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‘पूर्वी मी कराटेसुध्दा शिकलो होतो. अधूनमधून बॉक्सिंग खेळतो. आजही मी एका मुठीत तीन विटा तोडतो,’ हे सांगताना उदयनराजेंना स्वतचाच अभिमान वाटतो. त्यानंतर एक मोठा ग्लास मोसंबी ज्यूस पिऊन महाराज साहेब ऑफिसमध्ये पोहोचतात तोवर साडेआठ वाजलेले असतात. मग लोकांच्या गाठीभेटी. अनेक लोक आपल्या तक्रारी घेऊन किंवा कामं करून घेण्यासाठी त्यांची वाट पाहत असतात. काम करण्याची महाराज साहेबांची एक विशेष पद्धत आहे, अगदी राजाला शोभेल अशीच. आलेल्या माणसाने आपली समस्या काय आहे आणि ती सोडवण्यासाठी काय करावं लागेल; इतकंच महाराज साहेबांना सांगायचं. जास्त काथ्याकूट करायचा नाही. ‘काम होईल,’ म्हणून महाराज साहेब सांगतात, तेव्हा तो गरजवंत आश्चर्यचकीत झालेला असतो. महाराज साहेबांची कामं करायची पद्धत चांगली की वाईट, यावर मतभेद होऊ शकतात, पण ‘महाराज साहेब कुणालाच नाही म्हणत नाहीत, प्रत्येकाचं काम करतात,’ असं सातार्‍यातील अनेकजण सांगतात. स्वत:च्या अनुभवावरून.

दुपारी कोल्हापुरात असतील तर महाराज साहेब जेवायला घरी म्हणजे वाडय़ावर परततात. ‘मी शाकाहारी आहे. कारलं सोडून सगळ्या भाज्या खातो. नॉनव्हेजचं म्हणाल तर क्वचित मटण खातो. पण मला ते फारसं आवडत नाही.’ लोकांमध्ये सहजतेने मिसळणारा आणि त्यांच्यातच राहायला आवडणारा हा राजामाणूस देवधर्म, आणि त्यानुषंगाने येणारी कर्मकांडे यांबाबत उदासीन, म्हटलं तर पुरोगामी आहे. ‘माझा फक्त पंचतत्त्वांवर विश्वास आहे. पण कर्मकांडे मला पटत नाहीत,’ असं ते स्पष्टपणे सांगतात. पण लगेचच ‘राजघराण्यातील परंपरा-रूढी पटो न पटो त्या पाळल्याच पाहिजेत,’ असंही ते स्पष्ट करतात. त्यांच्या मते या रूढी-परंपराच आपली (म्हणजे त्यांची) ओळख आहे. ही त्यांची भूमिका थोडी सोयीस्कर वाटते. पण त्यावर महाराज साहेबांकडे वाद किंवा चर्चा होऊ शकत नाही.

Udayan Raje Palace

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पुढच्या पिढीनेही रूढी-परंपरा पाळून बेधडक लोकांची सेवा करत जगायला हवं, इति उदयनराजे.

उदयनराजेंची पुढची पिढी- त्यांचा मुलगा वीरप्रतापसिंहराजे पुण्यात त्याच्या आई कल्पनाराजेंसोबत असतो. उदयनराजेंच्या आई अर्थात श्रीमंत छत्रपती राजमाता कल्पनाराजे प्रतापसिंह महाराज भोसले सातार्‍याच्या जलमंदिर वाडय़ात राहतात. उदयनराजे लोकांमध्ये मिसळतात, तर कल्पनाराजे त्यांच्या नेमक्या विरुद्ध. लोक आजही त्यांना घाबरतात. जलमंदिरात त्यांच्याशी तब्बल दोन तास गप्पा मारण्याची संधी मिळाली. पण ऑफ द रेकॉर्ड! घराण्यातलं द्वेषाचं राजकारण, संधिसाधूपणा, विश्वासघात, अवहेलना (संदर्भ: अभयसिंह आणि शिवेंद्रराजे भोसले) याविषयी त्यांनी अगदी मनमोकळेपणाने गप्पा मारल्या. शेक्सपिअरने लिहिलेली सगळी नाटकं त्या दोन तासांत समजली.

घराणेशाहीतल्या कलहामुळे मधली बरीच वर्ष कल्पनाराजेंना बरंच सोसावं लागलं. त्याचा राग त्यांच्या मनात आजही आहेच. मध्यंतरी निवडणुकीच्या राजकारणातही त्यांनी उतरून पाहिलं. पण नशिबाने काही त्यांना साथ दिली नाही. आता वय झाल्यानंतर उदयनराजेंच्या राजकीय कारकीर्दीवरच त्यांनी आपलं लक्ष केंद्रित केलंय. पण तिथेही स्वत:च्या मुलाच्या कार्यपद्धतीशी त्यांची नाळ जुळत नाही. त्याचंही दुख आहेच. उदयनराजेंचे वडील म्हणजे प्रतापसिंहमहाराज यांचे धाकटे बंधू अभयसिंहराजे भोसले यांनीच घराण्याच्या नावाचा आणि समाजावरील प्रभावाचा फायदा घेत स्वतची राजकीय पोळी भाजली, असं कल्पनाराजेंचं स्पष्ट मत आहे.

खुद्द उदयनराजेंच्या विरोधातही अभयसिंहराजे आणि त्यांचा मुलगा शिवेंद्रराजे (म्हणजे उदयनराजेंचे चुलतबंधू) यांनी निवडणुकीचं राजकारण केलं. १९९६ मध्ये सातारा लोकसभा मतदारसंघातून अपक्ष उमेदवार म्हणून उदयनराजेंनी निवडणूक लढवली, पण त्यांच्या वाटय़ाला पराभव आला. त्यानंतर त्यांनी भाजपमध्ये प्रवेश केला आणि १९९८ च्या सातारा विधानसभा पोटनिवडणुकीत भाजपचे उमेदवार म्हणून उदयनराजे निवडून आले, आणि त्या वेळी युतीच्या सरकारमध्ये त्यांना महसूल राज्यमंत्रीपद देण्यात आलं. पण १९९९च्या विधानसभा निवडणुकीत अभयसिंहराजेंच्या विरोधात उदयनराजेंना पुन्हा पराभूत व्हावं लागलं. तर २००४ च्या विधानसभा निवडणुकीत शिवेंद्रराजेंनी उदयनराजेंचा पराभव केला होता. त्यानंतर उदयनराजेंनी कॉंग्रेसमध्ये प्रवेश केला, पण कॉंग्रेसकडून उमेदवारी मिळत नाही, हे कळल्यावर त्यांनी शरद पवारांशी संधान बांधलं.

कल्पनाराजे हा अपमानास्पद भूतकाळ विसरलेल्या नाहीत. आज उदयनराजे राष्ट्रवादीच्या तिकिटावर खासदार बनले आहेत, आणि जिल्ह्याच्या राजकारणावर त्यांची पूर्ण पकड आहे. शिवेंद्रराजे यांनीही त्यांच्याशी पॅच-अप केलंय. पण राजमातांना ही गोष्ट पटलेली नाही. राजमातांची सर्वात मोठी कामगिरी म्हणजे त्यांनी राजघराण्याच्या अनेक वास्तूंचा जीर्णोद्धार केलेला आहे. आज जलमंदिर म्हणून प्रसिध्द असलेल्या वाडय़ातली बहुतेक बांधकामंही त्यांनीच करून घेतली आहेत. त्याचा त्यांना अभिमान वाटतो. कल्पनाराजेंना मराठीत संवाद साधणं मात्र कठीण जातं. बोलताना अनेकदा मराठी शब्द न सुचल्याने त्या इंग्रजी शब्द, सराईतपणे वापरतात.

udayan raje family

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आपला साडेचार वर्षांचा नातू म्हणजे श्रीमंत छत्रपती वीरप्रतापराजे फ्ल्यूएंट इंग्रजी आणि हिंदीत बोलतो, याचं त्यांना अपार कौतुक! विशेष म्हणजे, राजमाता कल्पनाराजे आणि श्रीमंत छत्रपती उदयनराजे हे सुध्दा बहुतेकदा एकमेकांशी अस्खलित इंग्रजीतच संवाद साधताना दिसतात!

Udayan Raje Facebook Post

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खासदार म्हणून उदयनराजे लोकसभेवर निवडून गेल्यानंतर त्यांनी लोकसभेत त्यांचं पहिलं भाषण इंग्रजीत केलं, याचं सातारकरांना भयंकर कौतुक वाटलं होतं. भारावलेल्या सातारकरांनी उदयनराजेंचा लोकसभेत भाषण करतानाचा फोटो संपूर्ण जिल्ह्यात होर्डिगवर लावला. शिवाय, स्थानिक लोकल चॅनल्सने त्याची व्हिडिओ टेप वारंवार दाखवली होती. आपले महाराज साहेब इंग्रजीत बोलतात यावरच सातार्‍यातली प्रजा खूष आहे. मग असंतोषाला जागा राहतेच कुठे?

महाराष्ट्र म्हणजे मराठा आहे का ?

प्रिय महाराष्ट्र

काही दिवसांपूर्वी मराठा म्हणजे महाराष्ट्र असं पत्र लिहिलं होतं. पण महाराष्ट्र म्हणजे मराठा आहे का? असा प्रश्न स्वतंत्रपणे विचारू असं ठरवलं होतं. कारण टाळी एका हाताने वाजत नाही.

स्वातंत्र्य मिळण्यापूर्वी डॉक्टर आंबेडकरांनी खेड्यातून बाहेर पडा असा संदेश दलित समाजाला दिला. त्यांनी तो प्रामाणिकपणे मानला. हळू हळू मोठ्या संख्येने शहरात स्थलांतरीत झाले. गांधीजींनी सांगितलेला खेड्याकडे चला हा मंत्र शहरातल्या कुणी फारसा मनावर घेतला नाही. खेड्यात उरल्या फक्त शेती करणाऱ्या जाती. त्यातल्या मराठा वगळता बाकीच्या जातींना टप्प्या टप्प्याने आरक्षण मिळत गेले. शेती करणारी जात उरली बहुसंख्येने मराठा. पूर्वीपासून मराठ्यांना सुखावणारी एकच गोष्ट होती ती म्हणजे आपण राज्य करणारी जमात आहोत. आणि इथेच सगळ्यात मोठी फसवणूक होती. राज्य करणारे मराठे दहा टक्के आणि उरलेले ९० टक्के. स्वतःची शेती असून बेरोजगार. ७२ च्या दुष्काळाने मोठ मोठ्या शेतकऱ्याला खडी फोडायची वेळ आणली. शेतात अन्न पिकवून लोकांना पोसणाऱ्या बळीराजाला मिळालं काय? खडी फोडण्याची शिक्षा. या धसक्याने शहराकडे खूप मोठ्या प्रमाणात स्थलांतर झालं. ब्राम्हणांनी काळाची पावलं ओळखली. शिक्षण आणि नौकरीला प्राधान्य दिलं. पण बहुसंख्य मराठे शेती करत राहिले.

डोक्यात काय तर आपले लोक सत्तेत आहेत. शेतकऱ्यांच भलं होईल. त्यात हरित क्रांती. शेतकरी अलगद बहुराष्ट्रीय कंपनीच्या जाळ्यात ओढला गेला. बियाण्यां पासून खतापर्यंत गुलामी सुरु झाली. शेतकरी आपल्या नेत्यावर अवलंबून होता आणि नेते भांडवलदारावर. आज शेतकऱ्याचा सगळ्यात मोठा शत्रू कोण आहे तर या खत आणि बियाण्यांच्या कंपन्या. पण कुणालाच त्याविरुध्द आवाज उठवावा वाटत नाही. बहुराष्ट्रीय कंपन्या आणि अन्नधान्य व्यापाऱ्यांनी शेतक्याला रस्त्यावर आणलं. हळू हळू प्रत्येक मराठा अल्पभूधारक होऊ लागला. वीस वीस एकर शेती असणारे दोन तीन पिढ्यात अल्पभूधारक झाले. बांध पडत गेले शेतात आणि मनात. ज्यांची मनं सुपीक होती त्यांची शेतं मात्र कोरडवाहू राहिली. ज्या राजकारणावर आपण विसंबून राहिलो त्या राजकारणाने आपला विश्वासघात केला. बाकी जातींचा झपाट्याने विकास झाला, होतोय. पण आपण मागे राहिलो ही भावना मराठयांमध्ये निर्माण झाली. त्यात निसर्गानेसुद्धा नेहमीच मोठा अन्याय केला. आणि त्यात कोपर्डीची घटना घडली. आता काय होणार? हा प्रश्न पडला महाराष्ट्राला. मराठे कसे उत्तर देणार?

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इथे सगळ्यात मोठा बदल घडला. कुणाच्या डोक्यातून ही आयडिया आली माहित नाही. पण अत्यंत शिस्तबद्ध आणि शांततापूर्ण मराठा क्रांती मोर्चा निघाला. पुढे प्रत्येक जिल्ह्यात त्याची सुरुवात झाली. राजकारणात एकमेकांचे शत्रू म्हणून उभे राहणारे मराठे सगळ्यांनी पाहिले होते आजवर. पण गेल्या कित्येक वर्षात असे एकदिलाने एकत्र आलेले मराठे पाहिले नव्हते.

मराठा क्रांती मोर्चाचा बाह्य चेहरा आक्रमक वाटत असला तरी त्यात मागे रांगेत, कोपऱ्यात, खाली मान घालून सहभागी झालेले गरीब चेहरे बारकाईने बघा. ते सगळे पिचलेले, कर्जाच्या ओझ्याखाली दबलेले, मुलांच्या शिक्षणाच्या चिंतेने खचलेले मराठा शेतकरी बांधव आहेत. या लोकांकडे प्रामुख्याने मराठा मोर्चा आणि महाराष्ट्राने लक्ष द्यावं ही प्रामाणिक इच्छा आहे. या लोकांनी आळीपाळीने प्रत्येक राजकीय पक्षावर विश्वास ठेवला. दुर्दैव एवढच होतं की यांनी स्वतःवर कधीच विश्वास ठेवला नाही. अगदी आपला माल आपण स्वतः बाजारात विकू ही गोष्ट पण केली नाही. कारण एकच आपण सत्तेत आहोत ही फसवी जाणीव. आणि सत्तेतल्या दहा टक्के लोकांनी या नव्वद टक्के लोकांपर्यंत सत्तेचे पुरेसे फायदे पोचूच दिले नाहीत. पण सत्तेतल्या दहा टक्के लोकांच्या प्रत्येक दोषाची शिक्षा हा नव्वद टक्के मराठा भोगत असतो. चित्रपट पाहून सामाजिक भान तयार झालेल्या लोकांना गावातला प्रत्येक मराठा मग बुलेटवर दिसायला लागतो. प्रत्येक मराठ्याची विहीर, शेत, घर चित्रपटा सारखं असेल असं वाटू लागतं. प्रत्यक्ष जाऊन पाहिलं तर ती विहीर कोरडी ठाक असते. चित्रपट आणि वास्तव यातला हा मोठा फरक असतो. खेड्यातल्या शेतकरी मराठ्याची अवस्था त्या विहिरीसारखी आहे. ती बळेच भरलेली दाखवली जाते. पण ती प्रत्यक्षात कोरडी आहे.

तुम्ही फक्त पाटील नाव काढा महाराष्ट्रात. लोकांना चित्रपटातला खलनायक आठवू लागतो. हे फक्त आणि फक्त चित्रपटसृष्टीचं योगदान आहे. बाकी कुठल्याच आडनावाचा एवढा गैरवापर चित्रपटात झालेला दिसणार नाही. पाटील म्हणजे निळू फुले आणि त्यांचा संवाद म्हणजे ‘बाई वाड्यावर या.’ एवढी सोपी व्याख्या. शेतीच्या नादात गावातली माणसं रस्त्यावर येत असताना ही प्रतिमानिर्मिती आता संताप आणणारी ठरतेय. बरं खेडोपाडी पाटील कुठल्या एका जातीचे नव्हते हे सुद्धा लोकांच्या गावी नसतं. आता लोकांसाठी मराठवाडा विदर्भातले खरे पाटील दाखवायला एक पिकनिक काढली पाहिजे. त्याला लाईट आली तर पाणी कुठून आणू हा प्रश्न आहे, पाणी आलं तर खत कुठून आणायचं हा प्रश्न आहे. त्याच्यापुढचे प्रश्न संपायला तयार नाहीत. विश्वास बसणार नाही पण हे शेतकरी आता अस्पृश्यांसारखं जीवन जगतात.

Sindhudurg Maratha Kranti Morcha

Sindhudurg Maratha Kranti Morcha

स्वतःचा पीकविमा घ्यायला गेलेल्या शेतकऱ्याला बँकेत उभं करत नाहीत. कर्ज मागायला तर बँकेच्या आसपास पण फिरकू दिलं जात नाही. आपल्या म्हणवल्या लोकांच्या साखर कारखान्यात उस नेताना वागणूक सारखीच. बियाण्याच्या आणि खताच्या दुकानात अवस्था वेगळी नाही. या नवीन अस्पृश्यते बद्दल कुणी बोलायला तयार नाही. साधं उदाहरण सांगतो. गावात प्रचार करायला आमदार किंवा उमेदवार येतात ते गावातल्या पान टपरी वाल्याला भेटतात. फोटो काढतात. पण शेतात जाऊन एखाद्या शेतकऱ्याची चौकशी करायची तसदी घेत नाहीत. त्यांनी शेतकऱ्याला गृहीत धरलेलं असत. व्यापारी वर्गाची त्यांना काळजी असते. एकेकाळी ज्याच्या शेतातल्या खळ्यावर गावगाडा अवलंबून असायचा तो शेतकरी आज विश्वासानं कुणाच्या खांद्यावर डोकं ठेवावं याची वाट बघतोय. तो बहुसंख्येने मराठा आहे या गोष्टीकडे कुणी लक्ष देत नाही. नाटक, चित्रपटातले पाटील, सरपंच आणि आमदार म्हणजेच मराठा असं नाही. शेतकरी आत्महत्येची दर वर्षीची दर गावातली यादी वाचून बघा. त्यात जवळपास मराठाच आहेत. त्या शेतकरयासाठी या मोर्चाने मागण्या कराव्यात.

शेतकऱ्यासाठी हक्काची बाजारपेठ, हमीभाव आणि शेतकऱ्याच्या मुला मुलींचं पदवीचं संपूर्ण शिक्षण मोफत अशा मागण्या अनेक मागण्या आहेत. ज्या मागण्या सरकार तात्काळ मान्य करू शकतं. या गोष्टी तातडीने होण्याची खूप आवश्यकता आहे. शहरात लोकांना पाउस झाला की शेतकर्याचे प्रश्न सुटले असं वाटतं. पिक काय आपोआप उगवतं गवत उगवल्यासारखं असं वाटतं. पण हाच पाउस अवेळी येऊन वाट लावून टाकतो. शेती नुकसानीची आहे. पण आवश्यक आहे. सोडावी वाटते पण सोडवत नाही. जीवावर उदार होऊन शेती करणाऱ्या आणि नेहमी नुकसान सोसून लोकांचं पोट भरण्यासाठी अन्नधान्य पिकवणाऱ्या शेतकऱ्याचे प्रश्न या मोर्चातून सोडवले गेले पाहिजेत. मोर्चाची सुरुवात कोपर्डी प्रकरणापासून झाली. महाराष्ट्रातल्या प्रत्येक स्त्रीवरच्या अन्यायावर एवढी जळजळीत प्रतिक्रिया उमटली पाहिजे. तरच प्रत्येक गुन्हेगाराला वचक बसेल.

आज मराठा मोर्चाने जगासमोर एवढ्या एकीचं आणि शिस्तीच उदाहरण घालून दिलंय. इथून पुढे किमान महाराष्ट्रातला प्रत्येक मोर्चा असाच शांततेने आणि शिस्तीत निघावा ही अपेक्षा. यानिमित्ताने महाराष्ट्राने खुल्या दिलाने शेतकऱ्यासाठी आपला पाठिंबा दाखवावा. दबल्या आवाजात अॅट्रॉसिटीवर चर्चा करण्यापेक्षा सगळ्या जातींनी त्यावर एकत्र येऊन स्पष्ट बोलावं. या कायद्याने दलितांना न्याय मिळाल्याचं समाधान भेटलं नाही आणि इतर जातींना मात्र अन्याय होत असल्याची भावना झाली. म्हणून या कायद्याच्या निष्पक्ष आणि प्रभावी अमलबजावणीसाठी काय करता येईल याचा शांतपणे विचार व्हायला पाहिजे. कायदे संसद ठरवणार आणि त्याची एक पद्धत आहे हे विसरून चालणार नाही. पण कुठल्याही पक्षाच्या किंवा नेत्याच्या कुबड्या न घेता लोकांनी एकत्र यायला हवं हे उदाहरण यानिमित्ताने महाराष्ट्राने घ्यायला हवं.

आपल्याकडे आंदोलनं आणि मोर्चे ९० टक्के वेळा कुठल्यातरी राजकीय पक्ष किंवा विचारानी स्पॉन्सर केलेली असतात. अशाप्रकारे लोक स्वतःहून रस्त्यावर येणं दुर्मिळ असतं. या गोष्टीचं कौतुक करतानाच या लोकचळवळीचं प्रबोधन करण्यासाठी पुढाकार घेणं गरजेचं आहे. मुळात मोर्चा निघाला की लगेच अॅट्रॉसिटी रद्द होणार आहे असं म्हणून दोन्ही बाजूंनी भुई थोपटू नये. न्यायालयांच काम न्यायालय करेल. दलित समाजाने सामंजस्याने या मोर्चाचं स्वागत केलंय. प्रकाश आंबेडकर यांच्यासारख्या समंजस भूमिका मांडणाऱ्या लोकांचं मराठ्यांनी कौतुक केलंय. हे सामंजस्य टिकण्यासाठी महाराष्ट्राने प्रयत्न केले पाहिजेत. प्रतीमोर्चाच्या धमक्या देणाऱ्या नेत्यांनी आगीत तेल ओतण्याचं काम करू नये. त्याने आपलेच हात पोळण्याची जास्त शक्यता असते हे लक्षात ठेवावं. उलट समोर येऊन याच मोर्चात सामील व्हायची तयारी दाखवावी. दोन्ही बाजू एक एक पाउल पुढे आल्या तर हा महाराष्ट्राचा मोर्चा होईल. शेतकरयाना आरक्षण मिळू शकत नसेल तर आरक्षणात मिळणाऱ्या प्रत्येक सोयी शेतकऱ्याला मिळाव्यात अशी मागणी ताबडतोब मंजूर करून घेतली पाहिजे. काही पदरात पाडून घ्यायचं असेल तर तात्काळ हे होऊ शकतं. बाकी गोष्टीसाठी न्यायालयीन लढा लढावा लागणार आहे.

maratha kranti morcha thane image

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या आंदोलनातून असा तरुण समोर यावा जो या महाराष्ट्राच्या हिताचा विचार करणारा असेल. आता जिल्हे संपत आले. पण अजूनही सरकार ताबडतोब मंजूर करू शकेल अशी मागणी समोर आली नाही. न्यायालयाचं कारण न देता सरकार ताबडतोब कृती करेल अशी मागणी हवी. आणि ती फक्त शेतीशी आणि शिक्षणाशी संबंधित असू शकते. कोपर्डीसोबत बसच्या पासला पैसे नाहीत म्हणून जीव दिलेली मुलगी आठवा, पाण्यासाठी गेलेले चिमुकले जीव आठवा, कर्जापोटी गेलेली कर्ती माणसं आठवा. त्या सगळ्यांना न्याय मिळाला पाहिजे. इतर जातीतल्या शेतकऱ्याना या मोर्चामुळे दोन फायदे झाले तर ते आयुष्यभर आशीर्वाद देतील. एकत्र येतील. बाकी आजवर खेड्या पाड्यातला शेतकरी मराठा आपलीच सत्ता आहे या भ्रमात होता. सत्ता गेली हे खूप बरं झालं. भ्रम दूर झाला. आज मराठा आत्मपरीक्षण करतोय. नेत्यांसाठी नाही स्वतःसाठी रस्त्यावर येतोय.

छुपं नेतृत्व असत तर आजवर डोकावलं असत. मराठ्यांनी इतर जातींना सोबत घ्यावं अशी अपेक्षा आहे तशी इतर जातींनी स्वतःहून पुढे येऊन कुठल्याही नेत्याशिवाय एकवटलेल्या या चळवळीला विधायक वळण देण्यासाठी आपला वाटा उचलावा. मोठ्या भावाने समंजस असावं अशी अपेक्षा करताना छोट्या भावाने फक्त गंमत बघत बसावी असा अर्थ अपेक्षित नसतो. बाकी कुठल्याही जातीने जातीच्या नावावर कितीही गोष्टी केल्या तरी निवडणूक येते तेंव्हा आपोआप लोक समतेचा विचार करायला लागतात. आपसूक इतर जातींचा कळवळा येतो. ही एक आपल्या लोकशाहीने चांगली सोय केलीय. आजवरच्या मराठा नेतृत्वाला इतर जातींना खुश ठेवण्याच्या नादात आपल्याच जातीला आपण मागास ठेवतोय याची जाणीव झाली नाही. तरीही लोकशाही शेवटी प्रत्येकाला आपल्या जातीपलीकडे विचार करायला लावतेच. असो.

maratha morcha kolhapur t-shirt

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निवडणूक डोळ्यापुढे नसताना एवढे लोक एकत्र आलेत. या मोर्चाच्या नावावर जातीवाचक भाषा, भडक विधानं किंवा अफवा पसरवणाऱ्या लोकांपासून सावध रहा. आपल्याला आलेले भलते सलते मेसेज फॉरवर्ड करू नका. या मोर्चाचा कुणीच नेता नाही आणि कुणी तसा दावा करत असेल तर भूलथापांना बळी पडू नका. तर या मोर्चाच्या माध्यमातून स्त्रियांकडे बघण्याची सगळ्याच लोकांची नजर बदलो. शेतकऱ्यांची एकतरी मागणी पूर्ण होवो. कारण तुम्ही बारकाईने पहा. तुम्हाला कुठल्याच माणसाकडे बघून त्याची जात ओळखता येणार नाही. पण तुम्ही आज चेहरा बघून हा माणूस शेतकरी आहे हे नक्की सांगू शकता. आणखी किती हाल करायचे शेतकऱ्याचे? चला, त्याला आधी न्याय देऊ. तो महाराष्ट्रासाठी अभिमानाचा विषय असेल. जर आपला मोठा भाऊ शिस्तीत वागणारा असेल तर कुठल्या छोट्या भावाला अभिमान वाटणार नाही?आता यानंतर शेतमजूराविषयी सविस्तर.लवकरच.

लेखक – अरविंद जगताप.

घोडखिंडीचे शिलेदार…

एकीकडे शाहिस्तेखानाचे स्वराज्यावर आलेले संकट आणि दुसरीकडे छत्रपती शिवाजी महाराज पन्हाळगडाच्या वेढात असे दुहेरी संकट ओढ़ावले असताना शिवाजी महाराजांना या वेढ्यातून बाहेर पडणे आवश्यक होते. याच समयी सिद्दी जोहरशी तहाची बोलणी करून त्याला गाफील ठेवण्याचे राजकारण छत्रपती शिवरायांनी केले आणि १३ जुलै १६६० रोजी पन्हाळगडाच्या वेढ्यातून सुखरूप निसटले.

छत्रपती शिवाजी महाराजांचा राजकीय मुत्सद्दीपणा, नियोजनबद्धता, गुप्तहेर खात्याचे अचूक काम, प्रसंगावधानता, धाडस या सर्व गुणांची वेढ्यातून सुटका करून घेताना प्रचिती येते. बाकी एकाचवेळी घडणार्या अनेक घटना, संबंधित घटना ज्या भागात घडली आहे असे दर्शवले जाते तेथील भौगोलिक परिस्तिथी आणि समकालीन व उत्तरकालीन साधने यातील विसंगतीमुळे हे जे पन्हाळगड ते विशाळगडच्या मार्गात असलेल्या खिंडीत युद्ध झाले किंवा विशाळगडाच्या पायथ्याशी युद्ध झाले याचे निष्कर्ष काढण्यास अवघड आहे तरीही काही प्रचलित इतिहासानुसार जी माहिती समोर येते त्यात बांदल यांच्याकडील रायाजी बांदल, बाजी बांदल तसेच शंभूसिंग जाधव आणि बांदलांचे चिटणीस बाजीप्रभु देशपांडे यांच्यासहीत कैक अनामिक मावळे यांचा पराक्रम आणि हौताम्य आपल्यासमोर येतो. बाकी आपल्या स्वकृत्व आणि योजनाबद्ध रणनीतीमुळे शत्रूला आसमान दाखवत छत्रपती शिवाजी महाराज पन्हाळगडाच्या वेढ्यातून सुटून विशाळगडावर सुखरूप पोहचले ..

बांदल घराण्याच्या पराक्रमाच्या अखंड परंपरेला व बाजीप्रभु देशपांडे, शंभूसिंह जाधव तसेच कैक अनामिक मावळ्यांच्या बलिदानाला मानाचा मुजरा..

राज जाधव

घोडखिंडीचा नायक…

बाजीप्रभू देशपांडे पुणे जिल्ह्यातील भोर तालुक्यातील हिरडस मावळातले पिढीजात देशपांडे होते. बाजी प्रभू हे हिरडस मावळचे वतनदार असणाऱ्या बांदलांचे दिवाण होते. परंतु बाजींचे प्रशासकीय कौशल्य आणि शौर्य पाहून छत्रपती शिवाजी महाराजांनी हे अष्टपैलू व्यक्तिमत्त्व आपलेसे करून घेतले. बाजींनीही स्वराज्यासाठी आपली निष्ठा शिवाजीराजांना समर्पिली. बाजीप्रभू देशपांडे हे पराक्रमी लढवय्ये तर होतेच, तसेच ते त्यागी, स्वामिनिष्ठ, करारी, कोणत्याही आमिषाला बळी न पडणारे असे होते.

इ. स. २ मार्च १६६० मध्ये कर्नुलचा सरदार सिद्धी जौहर याने पन्हाळगडाला वेढा दिला. सुमारे ४ महिने उलटून हि सिद्धी वेढा ढिला करत नव्हता. भर पावसात हि सिध्दीने वेढा भक्कम ठेवला होता. सर्व उपाय करून झाले तरी यश येत नाही हे पाहून महाराजांनी वेढा फोडायचा एक धाडसी निर्णय घेतला. १२ जुलै १६६० च्या रात्री पन्हाळ्याला घातलेल्या सिद्धीच्या वेढ्यातून सुटून महाराज विशाळगडाकडे निघाले होते.बाजीप्रभू हे बांदल यांचे सरदार होते. त्यांच्यासोबत रायाजी बांदल,फुलाजी प्रभू आणि सुमारे ६०० बांदल मावळे होते. सिद्दीला तुरी देण्यासाठी आखलेला प्रतिशिवाजीचा डाव उघडकीस आला आणिआपली फसवणूक झाली हे लक्षात येऊन मसूद विजापुरी सैन्य घेऊन महाराजांचा पाठलाग सुरु केला. पुढचा धोका लक्षात घेऊनच वडीलकीच्या अधिकाराने बाजींनी महाराजांना विशाळगडाकडे पुढे जाण्यास सांगितले. बाजी व फुलाजी हे दोघे बंधू गजापूरच्या खिंडीत (घोडखिंडीत) सिद्धीच्या सैन्यासाठी महाकाळ म्हणून उभे राहिले. हजारोंच्या सैन्याला ३०० मराठी मावळ्यांनी रोखले होते. सतत २१ तास चालून शरीर थकलेल्या स्थितीत असतानाही बाजी आणि त्यांच्या मावळ्यांनी मोठ्या हिंमतीने ६ ते ७ तास खिंड लढविली आणि पराक्रमाची शर्थ केली.

सिद्धी मसूदचे सैन्य अडविताना कामी आलेले मराठी मावळे, धारातीर्थी पडलेले बंधू फुलाजी, जखमी झालेले स्वतःचे शरीर या कशाचेही भान बाजींना नव्हते. महाराज विशाळगडावर सुखरूप पोहोचले याचा इशारा देणाऱ्या तोफांच्या आवाजाकडे त्यांचे कान होते. तोफांचा आवाज ऐकेपर्यंत ते दोन्ही हातात तलवार, विटा घेऊन प्राणांची बाजी लावून लढत होते. खिंडीमध्ये महादेवाचा महारुद्र अवतार प्रकटलेला होता. बाजी आपल्याला काबीज होत नाही, हे पाहताच मसूद ने बंदूक मागवली. बंदुकीने बाजींवर वार केला. बाजी कोसळले, शरीरावरील जखमा आणि अथक प्रवास ह्यामुळे बाजींना ग्लानी आली. मावळ्यांनी ग्लानी येऊन पडलेल्या बाजींना मागे नेले, दुसरी फळी पुढे आली आणि खिंड लढत होती. बाजींना थोड्यावेळातच शुद्ध आली आणि त्यांनी तोफ झाल्याची विचारणा केली, नकारार्थी उत्तर येताच सर्व दम एकवटून जखमी बाजी परत खिंडीच्या तोंडाशी गणिमाना थोपवण्यासाठी गेले. त्याचवेळी विषलगडावरून झालेल्या तोफांचे आवाज ऐकल्यावर कर्तव्यपूर्तीच्या समाधानाने त्यांनी प्राण सोडले. (ही घटना दिनांक १३ जुलै, १६६० रोजी घडल्याची इतिहासात नोंद आहे.)

मराठी मावळ्यांच्या अभूतपूर्व अशा पराक्रमाने आणि बाजींसारख्या स्वराज्यनिष्ठांच्या पवित्र रक्ताने घोडखिंड पावन झाली म्हणूनच तिचे नाव पावनखिंड झाले. बाजी – फुलाजी बंधूंवर विशाळगडावर, महाराजांच्या उपस्थितीत अंत्यसंस्कार करण्यात आले. बाजीप्रभू व फुलाजी यांची समाधी विशाळगडावर आहे. तसेच पन्हाळगडावर बाजीप्रभूंचा पूर्णाकृती पुतळा उभारण्यात आलेला आहे.

घोडखिंड पावन झाली…!

अरे राजे म्हणून जन्माला आलो नाही म्हणून काय झाले. आज राजे म्हणून मरण्याचे भाग्य माझ्या नशिबी आले. माझ्या १० पिढ्यांची पुण्याईच माझ्या वाट्याला आली असे म्हणत शिवा काशीद यांनी प्राण सोडले. राजे निसटल्या मुळे सिद्दी जौहर वैतागला होता सिद्दी हिलाल ला त्याने राजेंच्या पाठीवर धाडले. राजेंची पालखी जिवाच्या बाजीने पळत होती हिरडस मावळातील बांदल देशमुख आणि वेळवंड खोऱ्यातील धुमाळ देशमुख आणि बाजी बांदल देखील पळत होते. आता सिद्दीची फौज येताना दिसू लागली काय करावे सुचेना. स्वराज्याच्या जीवाचा प्रश्न.

बाजी बांदल मोठ्या हिमतीचा माणूस आता जीवनावर बेलपत्र ठेवून शर्थीने लढायचे हे त्यांनी जोखले. बाजींचे डोळे निर्धाराने चमकू लागले. दाट झाडीत दडलेली मठ गजापुरची खिंड सहा फर्लांग लांबीची रौद्ररूप धारण केलेली घोडखिंड बाजींच्या संगती उभी होती. बाजी निर्धारपूर्वक म्हणाले
“महाराज, तुम्ही निमे लोक घेऊन गडावर निघून जाणे. तो पावेतो या खिंडीमध्ये आपण निमे मावळे घेऊन दोन दोन प्रहर पावेतो पाठीवर फौज येऊन देत नाही. साहेबी निघोन जाणे. आपण साहेब कामावरी मरतो. साहेब कामावरी पडलो तरी मुलांलेकरास अन्न देणार महाराज आहेत.”

राजे लवकर तयार झाले नसतीलच पण ऐकतील ते मावळे कसले आई भवानीच्या स्वराज्याच्या आणाभाका घालून राजांस पुढे पाठविले

आता राजे उरलेले मावळे सोबत घेऊन विशाळगडाकड़े निघाले. बाजींनी खिंडीमध्ये आपली व्युहरचना केली. चढणीवरच्या आणि आसपासच्या झाडीमध्ये गटागटाने मावळे तैनात केले. प्रत्येकाकडे गोफणीतून भिरकवायचे दगड आणि ढकलायचे शिलाखंड जमा केले गेले. शत्रु टप्यात येण्याची वाट बघत सगळे दडून बसले होते. १२-१३ तासांच्या अथक वाटचाली नंतर सुद्धा निवांतपणा नव्हता.

निर्णायक लढाईसाठी आता ते ३०० वीर सज्ज झाले होते. पूर्वेच्या दिशेने घोड्यांच्या टापांचे आवाज ऐकू येऊ लागले. थोड्यावेळात शत्रु नजरेत येऊ लागला पण शत्रुच्या नजरेत लपलेले मावळे काही येत नव्हते. त्या अवघड निसरड्या वाटेने एक रांग धरून सिद्दीमसूदचे घोडेस्वार उतरु लागले. गोफणीच्या टप्यात शत्रू आल्यावर बाजींनी एकच हाकाटी दिली आणि अचानक शत्रूच्या अंगावर दगड बरसू लागले. घोड्यांनी कच खाल्ली. काही उधळले. काही सरकून पडले. एकच गोंधळ उडाला.

कित्येकांची डोकी फुटली, बाकी जिवाच्या भीतीने मागे पळाले. मावळ्यांनी हर हर महादेवचा नारा दिला. पण शत्रू इतक्यात मागे सरकणार नव्हता. घोडेस्वार पुन्हा उतरु लागले. मावळ्यांनी पुन्हा दगड भिरकवायला सुरवात केली. ते शत्रूला काही केल्या पुढे सरकू देईनात. साधारण ४ वाजत आले होते. थोड़े मागून येणाऱ्या आदिलशहाच्या पिडनायकाचे पायदळ आता खिंडीकड़े येउन पोचले. ते अधिक वेगाने ओढ़यापलिकडे सरकू लागले. आता मावळ्यांनी त्यांच्यावर शिलाखंड ढकलायला सुरवात केली. त्यामुळे पायदळाची पांगापांग होऊ लागली. अखेर तासाभरानी शत्रूला वर पोहोचण्यात यश मिळाले.

आता आजूबाजुच्या झाडीमधून बाजी बांदल आणि इतर मावळे बाहेर पडले आणि प्रत्यक्ष रणमैदानात शस्त्राची लढाई सुरु झाली. एक-एक मावळा त्वेषाने लढत होता. दहा-दहा जणांना पुरून उरत होता. बाजींच्या तलवारीच्या टप्यात येणारा प्रत्येकजण यमसदनी जात होता.

स्वतःच्या छातीचा परकोट करून हा बाजी दोन्ही हातात तरवार घेऊन लढत होता. समोर येणाऱ्या प्रत्येकावर त्यांची जमदाड बरसत रणचंडी बाजींवर प्रसन्न झाली होती. इतरांचा आवेश देखील डोळ्यांचे पारणे फेडण्याजोगे होता. बाजीं बांदल, रायाजी बांदल आणि इतर बांदल मावळे लढत अनेक जण पडत होते. पडता पडता देखील दोघे तिघे घेऊनच ते जमिनीवर कोसळत होते. बाजींच्या अंगावर देखील अनेक जखमा झाल्या होत्या पण हा रणगाझी कुणाला वश होत नव्हता.

त्यांचा आवेश पाहून शत्रूचे धाबे दणाणले होते. बाजी आता अधिक त्वेषाने लढत होते. त्यांच्या देहाची आता चाळण उडाली होती. रक्ताचे अर्ह्य ओसंडत होते. हे काही आपली वाट सोडत नाहीत असे पाहून पिडनायकाने आपल्या एका पायदळ सैनिकाला ठासणीच्या बंदूकीतून बाजींवर गोळी झाडायला सांगितली. ती गोळी बाजींच्या खांद्यात घुसली. बाजींचा शस्त्राचा एक हात थांबला. लढता-लढता ते खाली कोसळले.

“बाजी बांदल” व “रायाजी बांदल” यांच्या सोबतीला “गुंजन मावळ, हिरडस मावळ आणि रोहीड खोरे” मधील इतरही काही मावळे होते. त्यात प्रामुख्याने शिंदे, गव्हाणे, चव्हाण, विचारे, खाटपे, सडे, धुमाळ, जाधव, शेलार, जगदाळे, भेलके, इंगळे आणि इतर काही मावळ्यांचा समावेश होता. “बाजी प्रभू देशपांडे” जे “बांदल” यांच्याकडे “चिटणीस / कारकून” म्हणून काम करत होते. यांनी लढविली खिंड….

©आम्हीच ते वेडे ज्यांना आस इतिहासाची

IAS अधिकारी घडविण्याकरीता काशिनाथ पाटील यांनी दान केले ३२ कोटी..

श्री साईबाबा संस्थान विश्‍वस्त व्यवस्थेस साई पालखी निवारा, निघोज या ठिकाणी राज्यातील गोरगरीब, आदिवासी, वंचित, दुर्बल विद्यार्थ्यांसाठी आय. ए. एस. ऍकॅडमी सुरू करण्यासाठी काशिनाथ गोविंद पाटील (रा. कोपरी, ता. वसई, जि. पालघर) यांनी त्यांच्या मालकीच्या एकूण 9 हजार 782.44 चौ.मी. जागा सुमारे 32 कोटी रुपये किमतीच्या बांधीव क्षेत्र असलेल्या दोन इमारती संस्थानला आज देणगीदाखल दिल्याची माहिती संस्थानच्या कार्यकारी अधिकारी रुबल अग्रवाल यांनी दिली.

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यावेळी अग्रवाल म्हणाल्या, “”श्री साईबाबा संस्थान विश्‍वस्त व्यवस्थेच्या 22 डिसेंबर 2016 रोजी संस्थानचे अध्यक्ष डॉ. सुरेश हावरे यांच्या अध्यक्षतेखाली झालेल्या सभेत काशिनाथ गोविंद पाटील (जि. पालघर) यांचे मौजे निघोज, ता. राहाता येथील गट नं. 177, 178, 282/1, 284 व 288/6 मधील भूखंड क्र. 1 मधील इमारत बी व डी विनामोबदला हस्तांतर करण्यास व या इमारतींमध्ये राज्यातील गोरगरीब, आदिवासी, वंचित, दुर्बल विद्यार्थ्यांसाठी राज्य लोकसेवा आयोगाच्या परीक्षेची तयारी करण्यासाठी तसेच प्रशासकीय सेवेचा लाभ मिळवून देणेकामी निवृत्त राजपत्रित अधिकाऱ्यांच्या मार्गदर्शनाखाली आय.ए.एस. ऍकॅडमी सुरू करण्यास मान्यता देण्यात आलेली आहे. या सभेस संस्थानचे उपाध्यक्ष चंद्रशेखर कदम, विश्‍वस्त सर्वश्री सचिन तांबे, मोहन जयकर, प्रताप भोसले, भाऊसाहेब वाकचौरे, बिपीनदादा कोल्हे, तत्कालीन विश्‍वस्त अनिता जगताप हे उपस्थित होते.

गुरुवारी (दि.11) काशिनाथ गोविंद पाटील यांनी त्यांच्या मालकीची राहाता तालुक्‍यातील निघोज येथील साई पालखी निवारामधील एकूण 9782.44 चौ.मी. इतके क्षेत्रफळ असलेल्या 32 कोटी 27 लाख 13 हजार 500 रुपये किमतीच्या दोन इमारती साईबाबा चरणी दान केल्या असून, सदरचे दानपत्र संस्थानच्या कार्यकारी अधिकारी रुबल अग्रवाल यांच्या हस्ते स्वीकारण्यात आले. यावेळी साईधाम मंदिर ट्रस्ट, विरारचे ट्रस्टी सर्वश्री काशिनाथ गोविंद पाटील, शेखर नाईक, प्रदीप तेंडोलकर, मोहन मुदलियार यांचा कार्यकारी अधिकारी अग्रवाल यांच्या हस्ते सत्कार करण्यात आला. यावेळी संस्थानचे उपकार्यकारी अधिकारी डॉ. संदीप आहेर, प्रशासकीय अधिकारी अशोक औटी, उपकार्यकारी अभियंता आर. बी. आहेर, संस्थान पॅनलवरील वकील ऍड. जे. के. गोंदकर, सल्लागार कृष्णा वालझाडे उपस्थित होते.